🌼 न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका 🌼
भारशिव क्षत्रिय इतिहास ग्रन्थमाला
ग्रन्थ: 1
अध्याय: 2 (भाग–17)
विषय: भारशिव नागों के ऐतिहासिक स्रोत, शिलालेख, मुद्राएँ और पुरातात्त्विक साक्ष्य
"किसी भी प्राचीन इतिहास की प्रमाणिकता उसके अभिलेखों, शिलालेखों, मुद्राओं, साहित्यिक उल्लेखों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर आधारित होती है।"
भारशिव नागों का इतिहास केवल जनश्रुतियों या परंपराओं तक सीमित नहीं है। इनके संबंध में अनेक ऐसे ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर इतिहासकारों ने उनके अस्तित्व, राजनीतिक महत्व और सांस्कृतिक योगदान का अध्ययन किया है। यद्यपि उपलब्ध स्रोत सीमित हैं, फिर भी वे इस राजवंश की ऐतिहासिक उपस्थिति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत:
1. वाकाटक ताम्रपत्र और "भारशिव" का उल्लेख
वाकाटक वंश के ताम्रपत्रों में "भारशिवानाम्" शब्द का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों में भारशिवों को ऐसे शासकों के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने अनेक अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए और भगवान शिव के प्रति विशेष श्रद्धा रखी। इतिहासकारों के अनुसार, ये अभिलेख संकेत देते हैं कि भारशिव एक प्रभावशाली राजवंश थे, जिनका उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों पर गहरा प्रभाव था।
2. पुराणों में नाग राजाओं का उल्लेख
विभिन्न पुराणों में नाग शासकों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि सभी स्थानों पर "भारशिव" नाम स्पष्ट रूप से नहीं आता, तथापि नाग वंशों की उपस्थिति और उनके राजनीतिक महत्व का वर्णन भारतीय परंपरा में पूरी तरह सुरक्षित है।
3. मुद्राएँ (सिक्के)
पुरातत्त्वविदों को उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों से नाग शासकों के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों से यह सिद्ध होता है कि नाग शासकों की अपनी सुदृढ़ राजनीतिक सत्ता, प्रशासनिक व्यवस्था थी ।

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