न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
महागुरुओं का ऋण : एक संकल्प, एक विरासत और आने वाली पीढ़ियों के नाम
(श्रृंखला – भाग–8 : समापन)
समय निरंतर चलता रहता है। व्यक्ति आते हैं, अपना कर्तव्य निभाते हैं और एक दिन इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। किंतु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने विचारों, अपने त्याग और अपने संस्कारों के कारण कभी इतिहास के पन्नों से ओझल नहीं होते। वे पीढ़ियों तक प्रेरणा बनकर जीवित रहते हैं।
जब मैं वर्ष 2014 की उस दोपहर को स्मरण करता हूँ, तो आज भी मेरे मन में वही दृश्य सजीव हो उठता है। मेरे पूज्य महागुरु आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी की नम आँखें, उनकी समाज के प्रति पीड़ा और उनके शब्द आज भी मेरे हृदय में उसी प्रकार गूँजते हैं, जैसे उस दिन गूँजे थे। उसी दिन मैंने उनके श्रीचरणों में यह संकल्प लिया था कि जब तक जीवन रहेगा, समाज के स्वाभिमान, शिक्षा, संगठन और आत्मगौरव के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य करता रहूँगा।
आज यदि समाज में अपने इतिहास के अध्ययन, आत्मसम्मान और संगठन के प्रति नई चेतना दिखाई देती है, तो उसका श्रेय केवल किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। यह अनेक समर्पित समाजसेवियों, शिक्षकों, चिंतकों और संगठनकर्ताओं की दीर्घकालीन साधना का परिणाम है।
मैं अपने पूज्य महागुरुओं आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी तथा आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उन सभी समाजसेवियों का भी सम्मान करता हूँ, जिन्होंने समाज में शिक्षा, संगठन और इतिहास के अध्ययन की भावना को आगे बढ़ाने का कार्य किया।
इसी क्रम में मैं आदरणीय श्री आर.के. सिंह सूर्यवंशी जी, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष, राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ, आदरणीय श्री अमरीश राय सूर्यवंशी जी, राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ, तथा आदरणीय श्री चंद्रमा जी, राष्ट्रीय इतिहासकार, राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ, के प्रयासों को भी सम्मानपूर्वक नमन करता हूँ। इन सभी ने अपने-अपने दायित्वों के माध्यम से समाज में संवाद, संगठन, इतिहास के अध्ययन और जागरूकता को आगे बढ़ाने का सतत प्रयास किया है।
मेरे सामाजिक जीवन का उद्देश्य किसी से विरोध करना नहीं, बल्कि अपने समाज में आत्मविश्वास, शिक्षा, संगठन और स्वाभिमान की भावना को मजबूत करना है। मेरे महागुरुओं ने मुझे सिखाया कि इतिहास का अध्ययन हमें विनम्र बनाता है, शिक्षा हमें सक्षम बनाती है, संगठन हमें शक्ति देता है और राष्ट्रभक्ति हमें महान बनाती है।
इसी प्रेरणा से मैं समाज के लोगों से आग्रह करता रहा हूँ कि वे अपने इतिहास का अध्ययन करें, उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों पर विचार करें और अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान का भाव रखें। समाज के अनेक लोग स्वयं को राजभर क्षत्रिय, भारशिव क्षत्रिय तथा अपनी वंश-परंपराओं के संदर्भ में समझते और व्यक्त करते हैं। मेरा विश्वास है कि इस विषय पर अध्ययन, शोध, संवाद और परस्पर सम्मान की भावना के साथ आगे बढ़ना ही समाज के हित में है।
मैं विशेष रूप से समाज के युवाओं से कहना चाहता हूँ कि वे अपने जीवन का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रखें। वे शिक्षा प्राप्त करें, चरित्रवान बनें, समाज को संगठित करें, अपने माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करें तथा भारत माता की सेवा को अपने जीवन का सर्वोच्च आदर्श बनाएँ। यही किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति है।
यदि आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वजों के आदर्शों से प्रेरणा लेकर ज्ञान, सेवा, संगठन और राष्ट्रनिर्माण का मार्ग अपनाती है, तो यही हमारे महागुरुओं के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
मैं अंत में अपने दोनों पूज्य महागुरुओं के श्रीचरणों में सादर प्रणाम करते हुए यही प्रार्थना करता हूँ कि उनका आशीर्वाद सदैव हम सब पर बना रहे। उनके द्वारा प्रज्वलित समाज-जागरण की यह ज्योति कभी मंद न पड़े, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी और अधिक प्रकाशित होती रहे।
गुरु का दिया हुआ ज्ञान कभी समाप्त नहीं होता। वह शिष्य के जीवन में संस्कार बनकर जीवित रहता है। यदि मेरे जीवन का कोई भी कार्य समाज के आत्मगौरव, शिक्षा, संगठन और राष्ट्रसेवा की दिशा में एक छोटा-सा योगदान दे सके, तो मैं अपने जीवन को धन्य मानूँगा।
यही मेरे महागुरुओं के श्रीचरणों में मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है।
✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

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