न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
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हागुरुओं का ऋण : स्वाभिमान की ज्योति और नई पीढ़ी का दायित्व
(श्रृंखला – भाग–7)
समाज का निर्माण केवल इतिहास से नहीं होता, बल्कि उस इतिहास से प्रेरणा लेकर वर्तमान में किए गए कर्मों से होता है। यही संदेश मेरे पूज्य महागुरुओं—आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी एवं आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी—ने अपने जीवन से दिया।
वे कहा करते थे कि कोई भी समाज तब तक महान नहीं बन सकता, जब तक उसकी नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के त्याग, अपने गुरुओं के आदर्श और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं समझती। केवल गौरवशाली अतीत का स्मरण पर्याप्त नहीं है; उस गौरव को वर्तमान के कर्मों से भी सिद्ध करना पड़ता है।
मैंने अपने महागुरुओं से यही सीखा कि समाज-जागरण का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। जिस घर में शिक्षा होगी, वहाँ संस्कार होंगे; जहाँ संस्कार होंगे, वहाँ संगठन होगा; और जहाँ संगठन होगा, वहाँ समाज का सम्मान स्वतः बढ़ेगा।
इसी प्रेरणा से मैंने अपने सामाजिक जीवन में जहाँ भी अवसर मिला, लोगों से आग्रह किया कि वे अपने इतिहास का अध्ययन करें, अपने पूर्वजों के योगदान को जानें और आत्मगौरव के साथ जीवन जीने का प्रयास करें। समाज के अनेक लोगों ने अपने ऐतिहासिक अध्ययन और परंपराओं के आधार पर स्वयं को राजभर क्षत्रिय, भारशिव क्षत्रिय तथा अपनी वंश-परंपराओं से जोड़कर देखने की भावना व्यक्त की है। मेरा प्रयास सदैव यही रहा कि इस विषय पर समाज में अध्ययन, संवाद और आत्मसम्मान की भावना बढ़े, साथ ही शिक्षा, संगठन और सामाजिक एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।
मैं यह भी मानता हूँ कि आत्मगौरव का वास्तविक अर्थ विनम्रता, अनुशासन और सेवा है। यदि हम स्वयं शिक्षित होंगे, अपने बच्चों को संस्कारित करेंगे, समाज में भाईचारा बढ़ाएँगे और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे, तभी हमारे महापुरुषों के सपने साकार होंगे।
आज जब मैं समाज के बीच जाता हूँ और युवाओं में नई ऊर्जा देखता हूँ, तो मुझे विश्वास होता है कि मेरे महागुरुओं का बोया हुआ बीज अब एक विशाल वटवृक्ष बनने की ओर अग्रसर है। यह परिवर्तन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सभी समाजसेवियों का सामूहिक प्रयास है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से समाज-जागरण का कार्य किया।
मैं अपने जीवन को भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे ऐसे महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। यदि मेरे कार्यों से समाज का कोई एक युवक भी शिक्षा, चरित्र, संगठन और राष्ट्रसेवा की राह पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है, तो मैं इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानूँगा।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अपने महागुरुओं की शिक्षाओं को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने जीवन के आचरण में उतारेंगे। शिक्षा को अपना अस्त्र, संगठन को अपनी शक्ति, संस्कार को अपनी पहचान और राष्ट्रसेवा को अपना सर्वोच्च धर्म बनाएँगे। यही हमारे महागुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

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