न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
महागुरुओं का ऋण : आत्मगौरव का जागरण और समाज सेवा का मेरा संकल्प
(श्रृंखला – भाग–6)
समाज का इतिहास केवल अतीत की स्मृतियों का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह वर्तमान को दिशा देने और भविष्य का निर्माण करने की शक्ति भी रखता है। यही शिक्षा मुझे मेरे पूज्य महागुरुओं आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी तथा आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी से प्राप्त हुई।
वे अक्सर कहा करते थे कि जिस समाज के भीतर आत्मगौरव जागृत हो जाता है, उस समाज को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। परंतु आत्मगौरव केवल शब्दों से नहीं आता; उसके लिए शिक्षा, अध्ययन, संगठन, अनुशासन और समाज के प्रति समर्पण आवश्यक है।
इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर मैंने अपने सामाजिक जीवन में जहाँ भी अवसर मिला, वहाँ समाज के लोगों को अपने इतिहास, अपनी परंपराओं और अपने आत्मसम्मान के विषय में विचार करने के लिए प्रेरित किया। मेरे महागुरुओं का विश्वास था कि प्रत्येक समाज को अपने अतीत का अध्ययन करना चाहिए और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों, परंपराओं तथा शोध के आधार पर अपनी पहचान को समझने का प्रयास करना चाहिए।
इसी प्रेरणा के आधार पर मैंने अपने सामाजिक अभियान में अनेक स्थानों पर यह संदेश दिया कि समाज अपने इतिहास का गंभीर अध्ययन करे तथा उन परंपराओं पर भी विचार करे, जिनमें समाज के अनेक लोग स्वयं को राजभर क्षत्रिय, भारशिव क्षत्रिय तथा अपनी वंश-परंपराओं से जोड़कर देखते हैं। मेरा उद्देश्य किसी पर विचार थोपना नहीं, बल्कि समाज में आत्मसम्मान, अध्ययन और संवाद की भावना को प्रोत्साहित करना रहा है।
मैंने सदैव यह अनुभव किया है कि जब कोई समाज अपने बारे में पढ़ना प्रारम्भ करता है, तब उसके भीतर हीनभावना कम होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। यही आत्मविश्वास शिक्षा, संगठन और सामाजिक प्रगति का आधार बनता है।
मेरे महागुरुओं ने मुझे समझाया कि समाज का वास्तविक उत्थान केवल अतीत के गौरव का स्मरण करने से नहीं होगा। यदि हम अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं देंगे, युवाओं को नेतृत्व के लिए तैयार नहीं करेंगे और समाज में आपसी सहयोग की भावना नहीं विकसित करेंगे, तो इतिहास का गौरव भी अधूरा रह जाएगा।
इसी सोच के साथ राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ के माध्यम से मेरा प्रयास रहा है कि समाज में संवाद बढ़े, संगठन मजबूत हो, युवाओं को आगे आने का अवसर मिले और समाज के प्रत्येक परिवार में शिक्षा तथा संस्कार का वातावरण बने। मेरा विश्वास है कि जब समाज का प्रत्येक घर शिक्षा, सेवा और आत्मसम्मान का केंद्र बनेगा, तभी वास्तविक जागरण होगा।
आज मैं अपने दोनों महागुरुओं के श्रीचरणों में नमन करते हुए यही कहना चाहता हूँ कि आपने जो दीपक मेरे हाथ में सौंपा था, उसे बुझने नहीं दूँगा। मेरी सामर्थ्य सीमित हो सकती है, पर मेरा संकल्प अटूट है। जब तक जीवन है, समाज की एकता, शिक्षा, संगठन, आत्मगौरव और राष्ट्रसेवा के लिए कार्य करता रहूँगा।
मैं समाज के युवाओं से विशेष आग्रह करता हूँ कि वे मतभेदों से ऊपर उठें, एक-दूसरे का सम्मान करें, इतिहास का अध्ययन करें, संविधान और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें तथा अपने कर्म, चरित्र और ज्ञान से समाज का नाम ऊँचा करें। यही हमारे महागुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मेरे लिए आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी और आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा हैं। उनका आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है और समाज की सेवा ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा धर्म।
✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

0 टिप्पणियाँ