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महागुरुओं का ऋण : गुरु का आशीर्वाद, समाज का विश्वास और मेरी जीवन-यात्रा PART 5

 न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका


महागुरुओं का ऋण : गुरु का आशीर्वाद, समाज का विश्वास और मेरी जीवन-यात्रा

(श्रृंखला – भाग–5)

जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को कोई-न-कोई ऐसा मार्गदर्शक अवश्य मिलता है, जो उसके भीतर सोई हुई शक्ति को पहचानकर उसे सही दिशा देता है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे दो महागुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ—आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी तथा आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी। उन्होंने मुझे केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी कराया।

आज जब मैं अपने जीवन की यात्रा पर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि यदि उस दिन मेरे घर पर वे दोनों महापुरुष न आए होते, यदि उन्होंने अपने हृदय की पीड़ा मेरे सामने व्यक्त न की होती और यदि उन्होंने मेरे भीतर समाज-जागरण की ज्योति न जलाई होती, तो शायद मेरा जीवन भी सामान्य रूप से बीत जाता। परंतु ईश्वर की कृपा और गुरुजनों के आशीर्वाद ने मेरे जीवन को समाज सेवा का मार्ग प्रदान किया।

गुरु केवल शिक्षा नहीं देता, वह जीवन का उद्देश्य भी देता है। मेरे महागुरुओं ने मुझे सिखाया कि समाज की सेवा किसी पद, सम्मान या प्रसिद्धि के लिए नहीं की जाती। सेवा का सबसे बड़ा पुरस्कार समाज का विश्वास और आने वाली पीढ़ियों का उज्ज्वल भविष्य होता है।

इसी भावना को लेकर मैंने अपने सामर्थ्य के अनुसार समाज के बीच जाने, लोगों को जोड़ने, संवाद स्थापित करने और संगठन को मजबूत बनाने का प्रयास किया। इस यात्रा में अनेक कठिनाइयाँ भी आईं, अनेक बार निराशा भी मिली, लेकिन जब भी मन डगमगाया, मुझे अपने महागुरुओं के वे शब्द याद आए—"सच्चा कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता। धैर्य रखो, समाज एक दिन अवश्य जागेगा।"

आज यदि समाज में शिक्षा, संगठन और आत्मसम्मान के विषय पर पहले से अधिक चर्चा हो रही है, यदि युवा अपने इतिहास और अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति रुचि दिखा रहे हैं, तो यह अनेक समर्पित समाजसेवियों की दीर्घकालीन तपस्या का परिणाम है। मैं स्वयं को उस तपस्या की परंपरा का एक छोटा-सा सेवक मानता हूँ।

राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ के माध्यम से मेरा प्रयास केवल संगठन का विस्तार करना नहीं है, बल्कि समाज में सेवा, शिक्षा, संस्कार और आत्मविश्वास की भावना को मजबूत करना है। मेरा विश्वास है कि कोई भी संगठन तभी सफल होता है, जब वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान दे, संवाद बनाए रखे और नई पीढ़ी को नेतृत्व के अवसर प्रदान करे।

मैं समाज के युवाओं से विशेष आग्रह करता हूँ कि वे अपने समय का सदुपयोग करें। आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें, प्रतियोगी परीक्षाओं में आगे बढ़ें, विज्ञान, प्रशासन, सेना, न्यायपालिका, शिक्षा और उद्यम जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाएँ। समाज का गौरव केवल इतिहास से नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की उपलब्धियों से भी बढ़ता है।

साथ ही, हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आत्मगौरव का अर्थ किसी दूसरे का अपमान नहीं है। अपने इतिहास, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान रखते हुए हमें सभी समाजों के साथ सद्भाव, सहयोग और संवैधानिक मूल्यों का पालन करना चाहिए। यही सच्चे अर्थों में एक जागरूक और उत्तरदायी नागरिक का कर्तव्य है।

मैं आज भी अपने दोनों महागुरुओं के श्रीचरणों में सिर झुकाकर यही प्रार्थना करता हूँ कि वे जहाँ कहीं भी हों, उनका आशीर्वाद समाज पर बना रहे। उनके द्वारा बोया गया जागरण का बीज एक विशाल वटवृक्ष बने और आने वाली पीढ़ियाँ उस छाया में ज्ञान, संस्कार और आत्मसम्मान का जीवन जी सकें।

यदि मेरे जीवन का कोई भी कार्य समाज के किसी एक युवक या युवती को शिक्षा, संगठन, सेवा और आत्मगौरव की राह पर चलने की प्रेरणा देता है, तो मैं अपने जीवन को सफल मानूँगा। यही मेरे महागुरुओं के प्रति मेरी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

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