न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
महागुरुओं का ऋण : विचारों से जागृत होता समाज, संस्कारों से बनता भविष्य
(श्रृंखला – भाग–4)
किसी भी समाज का उत्थान केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं होता, बल्कि उसके विचार, संस्कार, शिक्षा और संगठन की शक्ति से होता है। इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों ने अपने महापुरुषों के आदर्शों को अपनाया, उन्होंने समय की प्रत्येक चुनौती का साहसपूर्वक सामना किया और सम्मान के साथ आगे बढ़े।
मेरे पूज्य महागुरु आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी तथा आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी का भी यही विश्वास था कि समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसका चरित्र, उसकी शिक्षा और उसका आत्मसम्मान है। वे कहा करते थे कि कोई भी समाज तभी प्रगति करता है, जब उसकी नई पीढ़ी अपने अतीत का सम्मान करे, वर्तमान में परिश्रम करे और भविष्य के लिए दूरदृष्टि रखे।
उनका जीवन स्वयं एक संदेश था। उन्होंने कभी समाज को विभाजित करने की भाषा नहीं बोली। उन्होंने सदैव जोड़ने, शिक्षित करने और जागृत करने का कार्य किया। वे कहते थे कि यदि परिवार मजबूत होगा तो समाज मजबूत होगा, समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र भी मजबूत होगा।
उनके सान्निध्य में मैंने सीखा कि समाज सेवा केवल सभा, सम्मेलन या भाषणों तक सीमित नहीं होती। वास्तविक समाज सेवा तब होती है जब हम किसी बच्चे की शिक्षा में सहयोग करें, किसी निर्धन परिवार का हाथ थामें, युवाओं को नशामुक्त और संस्कारित जीवन की प्रेरणा दें, तथा समाज में आपसी प्रेम और सहयोग का वातावरण बनाएँ।
आज जब मैं समाज के बीच जाता हूँ और युवाओं की आँखों में अपने इतिहास को जानने की जिज्ञासा देखता हूँ, तो मुझे अपने महागुरुओं की बातें याद आती हैं। उन्होंने कहा था—"जिस दिन समाज का युवक अपने पूर्वजों के त्याग, परिश्रम और संस्कार को समझ जाएगा, उसी दिन समाज का भविष्य बदलना शुरू हो जाएगा।" यह वाक्य आज भी मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
मैं अपने अनुभव से यह भी कहना चाहता हूँ कि किसी भी समाज का गौरव केवल अतीत की स्मृतियों से नहीं बढ़ता। वह वर्तमान के अच्छे कार्यों से भी निर्मित होता है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, अपने बच्चों को उच्च संस्कार दें, समाज में आपसी सहयोग बढ़ाएँ और राष्ट्रहित को अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानें।
मेरे महागुरुओं ने मुझे यह भी सिखाया कि संगठन का अर्थ केवल लोगों की संख्या नहीं, बल्कि विचारों की एकता है। जब समाज के लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनते हैं, तब संगठन जीवंत होता है। यही भावना समाज को आगे बढ़ाती है।
यदि आज मुझे राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ के माध्यम से समाज की सेवा करने का अवसर मिला है, तो मैं इसे अपने महागुरुओं की प्रेरणा और उनके आशीर्वाद का परिणाम मानता हूँ। मैं स्वयं को उनका ऋणी मानता हूँ और यह मेरा प्रयास रहेगा कि उनके द्वारा जगाई गई चेतना की यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहे।
मैं समाज के प्रत्येक युवा से विनम्र आग्रह करता हूँ—अपने माता-पिता का सम्मान करें, अपने गुरुजनों का आदर करें, शिक्षा को अपना सबसे बड़ा धन बनाएँ, समाज में प्रेम और सद्भाव बनाए रखें तथा अपने जीवन को राष्ट्र और समाज की सेवा के लिए उपयोगी बनाएँ। यही हमारे महापुरुषों और महागुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मेरे लिए आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी और आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी केवल दो व्यक्तित्व नहीं, बल्कि दो ऐसे दीपस्तंभ हैं, जिनके प्रकाश ने मेरे जीवन का मार्ग आलोकित किया। मेरा विश्वास है कि जब तक उनके विचार समाज में जीवित रहेंगे, तब तक आत्मसम्मान, शिक्षा और संगठन की यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहेगी।
✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

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