न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
महागुरुओं का ऋण : तप, त्याग और समाज-जागरण का अमर अभियान
(श्रृंखला – भाग–3)
पहले और दूसरे भाग में मैंने उस अविस्मरणीय घटना का उल्लेख किया, जिसने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। आज मैं उन दोनों महापुरुषों के उस मौन तप की चर्चा करना चाहता हूँ, जिसे शायद इतिहास की पुस्तकों में बहुत स्थान न मिला हो, परंतु जिसने असंख्य लोगों के मन में आत्मगौरव की ज्योति प्रज्वलित की।
समाज में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो बिना किसी पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के जीवनभर समाज के लिए कार्य करते हैं। वे मंच से अधिक मनुष्य निर्माण को महत्व देते हैं। वे प्रसिद्धि से अधिक संस्कारों का प्रसार करते हैं। ऐसे ही दो तपस्वी व्यक्तित्व थे—आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी तथा आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी।
मैंने उन्हें कभी अपने लिए कार्य करते नहीं देखा। वे जहाँ भी जाते, समाज की बात करते, युवाओं को पढ़ने की प्रेरणा देते, अपने इतिहास को जानने का आग्रह करते और कहते कि जिस समाज को अपने पूर्वजों का ज्ञान नहीं होता, उसका भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी के मन में वैमनस्य नहीं, बल्कि आत्मसम्मान जगाते थे। उनका कहना था कि समाज की उन्नति का मार्ग संघर्ष से पहले शिक्षा, संगठन, चरित्र और जागरूकता से होकर जाता है। यदि समाज शिक्षित होगा, संगठित होगा और अपने कर्तव्यों को समझेगा, तो सम्मान अपने आप प्राप्त होगा।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि मेरे महागुरुओं ने केवल मेरे जीवन को नहीं बदला, बल्कि मेरे जैसे अनेक युवाओं के भीतर समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जगाई। उन्होंने हमें सिखाया कि समाज सेवा भाषणों से नहीं, बल्कि निरंतर कर्म, अनुशासन और त्याग से होती है।
समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, किंतु विचार अमर रहते हैं। आज समाज में अनेक लोग अपने इतिहास, अपनी परंपराओं और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा करते हैं। अनेक युवा अपने पूर्वजों के विषय में जानने की जिज्ञासा रखते हैं। मुझे यह देखकर संतोष होता है कि समाज में आत्मगौरव की भावना पहले की अपेक्षा अधिक दिखाई देती है। मैं इसे उन सभी समाज-जागरण करने वाले महापुरुषों की तपस्या का परिणाम मानता हूँ, जिनमें मेरे पूज्य महागुरुओं का स्थान अत्यंत सम्माननीय है।
मेरे महागुरु कहा करते थे—"समाज को आगे बढ़ाना है तो पहले स्वयं को बदलो। अपने बच्चों को शिक्षित बनाओ, उन्हें संस्कार दो, समाज से जोड़ो और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखो।" आज मुझे लगता है कि यही किसी भी समाज के उत्थान का सबसे बड़ा सूत्र है।
मैं नई पीढ़ी से कहना चाहता हूँ कि अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखना केवल उनका नाम लेने से पूरा नहीं होता। उनके आदर्शों को जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्चा सम्मान है। यदि हम शिक्षा को अपनाएँ, आपसी मतभेदों को छोड़कर संगठन की भावना विकसित करें, समाज में सद्भाव बनाए रखें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानें, तभी हम अपने महापुरुषों के सपनों को साकार कर सकेंगे।
मेरे लिए आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी और आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी किसी एक परिवार या एक क्षेत्र की धरोहर नहीं हैं। वे उन सभी लोगों के प्रेरणास्रोत हैं, जो समाज के उत्थान के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करना चाहते हैं। ऐसे महापुरुषों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलकर ही किया जा सकता है।
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अपने महागुरुओं के आदर्शों पर चलने की शक्ति दें और समाज को ऐसे तपस्वी, त्यागी और दूरदर्शी मार्गदर्शक सदैव मिलते रहें।
(क्रमशः — भाग–4 : "महागुरुओं के विचारों से समाज में आई नई चेतना")
✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

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