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महागुरुओं का ऋण : एक संकल्प जिसने मेरे जीवन का उद्देश्य तय कर दिया PART 2

 न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका


महागुरुओं का ऋण : एक संकल्प जिसने मेरे जीवन का उद्देश्य तय कर दिया

(श्रृंखला – भाग–2)

भाग–1 में मैंने उस अविस्मरणीय दिन का उल्लेख किया था, जब वर्ष 2014 के मई माह में मेरे घर पर आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी और आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। उस दिन केवल समाज के इतिहास पर चर्चा नहीं हुई थी, बल्कि मेरे जीवन की दिशा ही बदल गई थी।

जब आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी समाज की स्थिति का वर्णन करते-करते भावुक हो गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, तब मैं स्वयं भी अपने आँसू नहीं रोक सका। मेरे हृदय में ऐसा लगा मानो मेरे अपने पिता अथवा गुरु की पीड़ा मेरे सामने साकार हो गई हो। उस क्षण मैंने अनुभव किया कि समाज की वेदना केवल सुनने की नहीं, बल्कि उसे दूर करने के लिए जीवन समर्पित करने की आवश्यकता है।

उसी भावुक वातावरण में मैंने अपने दोनों पूज्य महागुरुओं के श्रीचरणों में एक संकल्प लिया। मैंने विनम्रतापूर्वक कहा—

"गुरुदेव, अब आप चिंता छोड़ दीजिए। आप विश्राम कीजिए। आज से यह दायित्व मेरा है। जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे, मैं समाज के स्वाभिमान, उसके इतिहास और उसके सम्मान के लिए अपनी पूरी शक्ति से कार्य करता रहूँगा।"

मेरे जीवन का वह संकल्प आज भी मेरे लिए एक व्रत है। मैं मानता हूँ कि गुरु के समक्ष दिया गया वचन केवल शब्द नहीं होता, बल्कि जीवनभर निभाने योग्य धर्म होता है।

मेरे महागुरुओं ने मुझे समाज के इतिहास, उसकी परंपराओं और उसके आत्मगौरव का बोध कराया। उन्होंने प्रेरित किया कि समाज अपने अतीत को जाने, उसका अध्ययन करे और सम्मान के साथ अपनी पहचान को स्वीकार करे। उसी प्रेरणा ने मेरे भीतर समाज-जागरण का दीप प्रज्वलित किया।

आज जब मैं समाज के अनेक लोगों को आत्मविश्वास के साथ अपनी परंपरा और अपनी क्षत्रिय पहचान के बारे में गर्वपूर्वक बोलते हुए देखता हूँ, तो मेरे मन में सबसे पहले अपने दोनों महागुरुओं का स्मरण आता है। यदि समाज में आत्मगौरव की यह चेतना बढ़ी है, तो उसके पीछे अनेक समर्पित लोगों का परिश्रम है, जिनमें आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी और आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी का योगदान मेरे लिए अत्यंत प्रेरणास्पद रहा है।

उन्होंने कभी सम्मान या प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की। वे चाहते थे कि समाज जागे, शिक्षित बने, संगठित हो और अपने इतिहास तथा संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव विकसित करे। उन्होंने स्वयं प्रकाश में आने के बजाय दूसरों को आगे बढ़ाया। ऐसे व्यक्तित्व वास्तव में समाज के मौन तपस्वी होते हैं।

आज यदि अनेक घरों में समाज के लोग अपने गौरव, अपनी परंपराओं और अपने स्वाभिमान की चर्चा करते हैं, यदि नई पीढ़ी अपने इतिहास को जानने के लिए उत्सुक दिखाई देती है, तो मुझे अपने दोनों महागुरुओं की तपस्या का फल दिखाई देता है। किसी भी समाज का वास्तविक उत्थान तब होता है, जब उसके भीतर आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जागृत होता है।

मेरे लिए आदरणीय श्री वंशराज मास्टर जी और आदरणीय श्री लालजी राय एडवोकेट जी भरतवंशी केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार, एक प्रेरणा और एक युग हैं। उन्होंने मेरे जीवन को जो दिशा दी, वही आज मेरी सामाजिक यात्रा की सबसे बड़ी पूँजी है।

मैं अपने दोनों महागुरुओं के श्रीचरणों में बारंबार नमन करता हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके द्वारा प्रज्वलित यह समाज-जागरण का दीपक आने वाली पीढ़ियों तक निरंतर प्रकाश देता रहे।

(क्रमशः — भाग–3 में पढ़िए : "महागुरुओं का तप, समाज का स्वाभिमान और हमारी आने वाली पीढ़ियों का दायित्व")

✍️ कैलाश नाथ राय भरतवंशी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

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