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भार-शिव (राज-भर) राजवंश का प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य (प्रमाण-पत्र)

 🚩 भार-शिव (राज-भर) राजवंश का प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य (प्रमाण-पत्र) 🚩


विषय: सूर्यवंशी पिता, नागवंशी माता/परंपरा, प्रतापी राजाओं (पुत्रों) एवं 'राजभर' वंश का स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण।



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१. सूर्यवंशी पिता एवं नागवंशी माता का पावन संगम:

वाकाटक और नाग-भारशिव राजवंशों के ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, भार-शिव राजवंश का उदय सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा और नागवंशी राजपरिवारों के संगम से हुआ है।

• पितृ पक्ष (सूर्यवंश): भार-शिव क्षत्रिय वंश का संबंध सनातन सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से स्थापित है।

• मातृ पक्ष (नागवंश): प्राचीन कान्तिपुरी, पद्मावती और मथुरा के नागवंशी क्षत्रियों (जैसे नाग सम्राट महाराजा भवनाग) का वैवाहिक संबंध भार-शिव सूर्यवंशी राजाओं के साथ हुआ। भार-शिव राजाओं ने अपनी माता एवं पिता दोनों वंशों की महान परंपराओं का पूर्ण पालन किया, जिससे उन्हें 'नागवंशी क्षत्रिय' और 'सूर्यवंशी राजपुत्र' दोनों रूपों में मान्यता मिली।


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२. प्रमुख भार-शिव राजा (प्रतापी पुत्र व वंशज):

कुषाण-म्लेच्छों का विनाश करने वाले तथा आर्यावर्त की रक्षा करने वाले प्रमुख भार-शिव राजाओं के नाम शिलालेखों में दर्ज हैं:

• महाराजा वीरसेन भारशिव: इन्होंने विदेशी म्लेच्छ कुषाणों को पराजित कर उत्तर भारत से खदेड़ा।

• महाराजा नवनाग व महाराजा भवनाग: ये भार-शिव वंश के वे महान राजा हुए जिन्होंने काशी (वाराणसी) के पवित्र गंगा तट पर १० अश्वमेध यज्ञों का भव्य अनुष्ठान किया था।

• महाराजा नवनाग के बाद भार-शिवों की शाखाएँ उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हुईं।


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३. कालांतर में 'भार-शिव' से 'भर / राजभर' नाम में परिवर्तन का प्रामाणिक इतिहास:

• साम्राज्य का विकेंद्रीकरण: चौथी-पाँचवीं शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के अभ्युदय और मध्यकाल में निरंतर विदेशी आक्रमणों के कारण भार-शिवों की केंद्रीय सत्ता छोटी-छोटी रियासतों और सामंती दुर्गों में बंट गई।

• शब्द का अपभ्रंश (भाषा परिवर्तन): 

  - भाषा के प्राकृत व क्षेत्रीय अपभ्रंशों के कारण 'भार-शिव' शब्द से 'शिव' शब्द कालान्तर में लोप हुआ।

  - 'भार' शब्द जनभाषा में 'भर' बना।

  - स्वतंत्र राज्यों और गढ़ियों पर शासन (राज्य) करने की परंपरा के कारण इन्हें 'राज-भर' (राज्य करने वाले भर क्षत्रिय) कहा जाने लगा।

• यही भार-शिव राजवंश के प्रत्यक्ष वंशज आज भर/राजभर समाज के रूप में जाने जाते हैं।


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४. ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं शिलालेखीय दस्तावेज (प्रामाणिक साक्ष्य):

यदि किसी को इस पर शंका हो, तो वे निम्नलिखित पुरातात्विक संदर्भों का अध्ययन कर सकते हैं:


१. वाकाटक नरेशों का चम्मक एवं सिवनी ताम्रपत्र (संस्कृत अभिलेख):

   वाकाटक अभिलेखों में स्पष्ट लिखा है—

   "अंसभार सन्निवेशित शिव लिंगस्य भारशिवानाम्"

   (अर्थात् जिन्होंने अपने कंधों पर शिवलिंग धारण किया और काशी में १० अश्वमेध यज्ञ किए, उन भार-शिवों की वंश परंपरा।)


२. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. के. पी. जायसवाल का शोध ग्रंथ:

   डॉ. के. पी. जायसवाल ने अपनी पुस्तक 'अंधकारयुगीन भारत' (Dark Period of India) के पृष्ठों में स्पष्ट लिखा है कि म्लेच्छों (कुषाणों) से भारत भूमि को मुक्त कराने वाले भार-शिव ही आधुनिक भर/राजभर राजवंश के पूर्वज हैं।


३. काशी का 'दशाश्वमेध घाट':

   वाराणसी का प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट भार-शिव राजाओं द्वारा किए गए १० अश्वमेध यज्ञों का प्रत्यक्ष पुरातात्विक साक्षी है।


४. प्राचीन सिक्के:

   पद्मावती और कान्तिपुरी से प्राप्त महाराजा भवनाग, वीरसेन और नवनाग के सिक्कों पर अंकित नंदी, त्रिशूल और शिवलिंग भार-शिवों के स्वतंत्र साम्राज्य के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।


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निष्कर्ष:

भार-शिव (राजभर) राजवंश का इतिहास किसी की कपोलकल्पित रचना नहीं, बल्कि वाकाटक ताम्रपत्रों, शिलालेखों, सिक्कों और प्रामाणिक इतिहास ग्रंथों द्वारा प्रमाणित सूर्यवंशी-नागवंशी सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय परंपरा है।


प्रमाण प्रस्तुतकर्ता:

कैलाश नाथ राय

(राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ / सम्पादक — साप्ताहिक 'न्यू मार्तण्ड')

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