📰 न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
ज्ञान का प्रकाश – समाज का विकास
विशेष सम्पादकीय
मैं कौन हूँ? – एक साधक की आत्मखोज और मेरी पूर्ण हुई खोज
✍️ स्वर्गीय श्री हरि प्रसाद राय भरतवंशी के पौत्र एवं आदरणीय श्री अक्षैबर लाल राय भरतवंशी के सुपुत्र
कैलाश नाथ राय भरतवंशी, अभ्यासी भाई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
संपादक – न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
🌹 प्रस्तावना
मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न है—"मैं कौन हूँ?"
इसी प्रश्न ने ऋषियों को वन में तप करने के लिए प्रेरित किया, बुद्ध को राजमहल छोड़ने के लिए प्रेरित किया, कबीर को सत्य की खोज में लगाया, स्वामी विवेकानन्द को आत्मा की दिव्यता का संदेश देने के लिए प्रेरित किया और रमण महर्षि को जीवन भर "मैं कौन हूँ?" के चिंतन में स्थिर रखा।
मैं भी लगभग तीस वर्षों से सहज मार्ग की साधना, ध्यान, मौन और आत्मचिंतन के माध्यम से इसी प्रश्न का उत्तर खोज रहा था। इस यात्रा में मुझे दर्जन भर गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ। अनेक संतों, शास्त्रों और आध्यात्मिक परंपराओं का अध्ययन किया। अंततः पूज्य लालाजी महाराज और बाबूजी महाराज, जो मेरे इक्कीसवें गुरु के रूप में जीवन में आए, उनके सहज मार्ग ने मेरी आत्मयात्रा को नई दिशा दी।
🌹 एक सप्ताह का मौन और आत्मानुभूति
हाल ही में मैंने एक सप्ताह का मौन धारण किया। यह मौन केवल वाणी का नहीं, बल्कि मन के कोलाहल को शांत करने का प्रयास था। उसी मौन में बार-बार एक ही प्रश्न उठता रहा—
"मैं कौन हूँ?"
धीरे-धीरे भीतर से उत्तर आने लगा—
मैं यह शरीर नहीं हूँ। यह शरीर पंचतत्वों से बना है और एक दिन पंचतत्व में विलीन हो जाएगा। मेरे भीतर जो चेतना है, वही परम चेतना का अंश है।
🌹 श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
(गीता – अध्याय 2, श्लोक 22)
न जायते म्रियते वा कदाचित्। नायं भूत्वा भविता वा न भूयः॥
(गीता – अध्याय 2, श्लोक 20)
अर्थात् आत्मा न जन्म लेती है और न कभी मरती है।
🌹 संतों और महापुरुषों की अनुभूतियाँ
संत कबीरदास जी – "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।"
आदि शंकराचार्य – "अहं ब्रह्मास्मि।"
स्वामी विवेकानन्द – "प्रत्येक आत्मा मूलतः दिव्य है।"
रमण महर्षि – "मैं कौन हूँ?" यही उनकी साधना का मूल प्रश्न था।
गौतम बुद्ध – "अप्प दीपो भव" – अपने भीतर का प्रकाश स्वयं खोजो।
श्री रामकृष्ण परमहंस – "ईश्वर का अनुभव ही मानव जीवन का परम उद्देश्य है।"
उपनिषद् – "ईशावास्यमिदं सर्वम्" – यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है।
🌹 गृहस्थ आश्रम में भी ईश्वर की प्राप्ति संभव है
मेरी साधना का एक महत्वपूर्ण अनुभव यह भी है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल जंगल, पर्वत, गुफाओं या संन्यास में ही संभव नहीं है।
मैंने गृहस्थ आश्रम में रहते हुए, परिवार, समाज और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए, लगभग तीस वर्षों की साधना, ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से यह अनुभव किया है कि—
यदि मन में सच्ची लगन, गुरु कृपा, नियमित साधना और ईश्वर के प्रति समर्पण हो, तो सब कुछ संभव है।
गृहस्थ आश्रम में रहकर भी मनुष्य आध्यात्मिक शांति और ईश्वर के निकटता का अनुभव कर सकता है।
ईश्वर किसी विशेष स्थान में सीमित नहीं हैं। वे हमारे हृदय में विद्यमान हैं। उन्हें पाने के लिए सबसे अधिक आवश्यकता बाहरी त्याग की नहीं, बल्कि अंतर्मन की जागृति, प्रेम, साधना और समर्पण की है।
🌹 मेरी व्यक्तिगत अनुभूति
लगभग तीस वर्षों की साधना, ध्यान, मौन और आत्मचिंतन के पश्चात् आज मेरा अंतःकरण गवाही देता है—
"जिसे मैं बाहर खोज रहा था, वह मेरे भीतर ही विद्यमान था।"
आज ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी वर्षों की खोज को एक उत्तर मिल गया है। अब न धन की लालसा है, न पद की इच्छा, न किसी प्रकार का तनाव। भीतर भी शांति है, बाहर भी शांति है।
अब बच्चे, वृद्ध, गरीब, अमीर—सभी अपने प्रिय प्रतीत होते हैं। जाति, धर्म, ऊँच-नीच के भेद कम होते दिखाई देते हैं। सबमें एक ही चेतना, एक ही परमात्मा का प्रकाश दिखाई देता है।
🌹 महान संतों के अनुभव और मेरी अनुभूति
संतों ने अलग-अलग शब्दों में एक ही सत्य की ओर संकेत किया—
• कबीर – "हरि ही हरि हैं।"
• विवेकानन्द – "हर आत्मा दिव्य है।"
• रमण महर्षि – "अपने 'मैं' की खोज करो।"
• बुद्ध – "अपने भीतर जागो।"
• उपनिषद् – "तत्त्वमसि – तू वही है।"
इन सभी महापुरुषों की वाणी से मुझे यही प्रेरणा मिली कि आत्मखोज का मार्ग भीतर की ओर जाता है।
🌹 मेरी खोज पूर्ण हुई
मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने अंतिम सत्य को पूर्णतः जान लिया है, क्योंकि सत्य अनंत है। परंतु एक साधक के रूप में आज मेरा हृदय यह अवश्य कहता है—
"जिस शांति और उत्तर की मैं वर्षों से खोज कर रहा था, उसकी झलक मुझे प्राप्त हुई है।"
"लगन हो तो सब कुछ संभव है।"
"जिसे मैं बाहर खोज रहा था, वह मेरे भीतर ही विराजमान था।"
और अब मेरे अंतःकरण से केवल यही स्वर निकलता है—
"अब हरि ही हरि हैं, मैं कुछ भी नहीं हूँ।"
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।"
यह मेरी व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभूति है। मैं इसे किसी पर थोपना नहीं चाहता, बल्कि एक साधक की विनम्र आत्मयात्रा के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। यदि मेरी यह यात्रा किसी एक व्यक्ति को भी अपने भीतर झाँकने, ध्यान करने और आत्मचिंतन करने की प्रेरणा दे, तो मैं अपने जीवन को धन्य मानूँगा।
🌹 सर्वे भवन्तु सुखिनः।
🌹 सर्वे सन्तु निरामयाः।
🌹 वसुधैव कुटुम्बकम्।
जय क्षत्रिय – जय भारत – जय मानवता
✍️ स्वर्गीय श्री हरि प्रसाद राय भरतवंशी के पौत्र एवं आदरणीय श्री अक्षैबर लाल राय भरतवंशी के सुपुत्र
कैलाश नाथ राय भरतवंशी, अभ्यासी भाई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
संपादक – न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका
🙏🌹 बाबूजी महाराज एवं लालाजी महाराज की कृपा सर्वत्र बनी रहे। 🌹🙏

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