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भर, राजभर या भरतवंशी का अति संक्षिप्त सच्चा इतिहास


 भरतवंशी राजभर महासभा

(राज्य स्तरीय संगठन)

उत्तर प्रदेश

भर, राजभर या भरतवंशी का अति संक्षिप्त सच्चा इतिहास

माननीय सुदर्शन, स्वजातिभूषण।

भरत शब्द का अपभ्रंश भर है। गीता भारतवाणी, भर से राजभर शब्द बना है।

स्वायंभुव मनु के वंश में सतयुग के प्रारम्भ के समय सृष्टि की रचना हो जाने पर प्रभु महाराज के पुत्रों से ही यह सृष्टि उत्पन्न होकर प्रियव्रत (विष्णु पुराण से यथावर्णित अध्याय) उत्पन्न पद के पुत्रों से उत्पन्न और राजमहर्षि सुमति से पुत्र उत्पन्न हुए। बालक ध्रुव की तपस्या जगजाहिर है। (विष्णु पुराण तेरहवाँ अध्याय से) आगे इन्हीं के वंश में महाराजा पृथु हुए, जिनसे इस सर्वप्रथम धारणीय वसु का नाम पृथ्वी पड़ा। आगे और भी वंशज हुए हैं, किन्तु संक्षिप्तता के कारण पूरा लिखना यहाँ सम्भव नहीं है।

(विष्णु पुराण द्वितीय अंश प्रथम अध्याय से)

प्रियव्रत के वंश का वर्णन – प्रियव्रत के वंशजों में महात्मा नामि और मन्वेदी से कल्पदेव जी का जन्म हुआ और कल्पदेव से भरत जी का जन्म हुआ, जो उनके 100 पुत्रों में सबसे बड़े थे। महाराजा भरत जी के नाम से इस देश का नाम लोक में भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ। आगे कई पुत्र-पौत्रादि होते चले गये। इनमें विश्वज्योति प्रधान था। भारतवर्ष को नौ भागों में विभाजित कर उन्होंने अमरावती से पूर्वांचल में इन्द्रप्रस्थ की स्थापना की। इसमें एकादश्य पुत्र परन्तु हरि नाम युक्ति नेगरा था। इन्हीं से यवन और राजवंश इन्हीं में से था। सतयुग के नायक सत्यसिंह, हरिश्चन्द्र और त्रेता के नायक श्रीराम हुए हैं।

सामर्थ्य में भरतवंशी पाण्डव (अर्जुन आदि) हुए और यदुवंशी श्रीकृष्ण हुए। यदुवंश और भरतवंश महाराजा ययाति से उत्पन्न हुए हैं। संक्षिप्त महाभारत ग्रन्थ में पृष्ठ संख्या दो पर आया है कि इस महाभारत ग्रन्थ में भरतवंश का सम्पूर्ण इतिहास है। महाभारत के युद्ध के बाद भरतवंशी राजाओं की शक्ति टूट गयी। दूसरे लोग जैसे शक, हूण, कुषाण आदि का राज्य हो गया।

"गदर के फूल" नामक ग्रन्थ में महाराज अमर लाल नागर जी, जो भारत के महान लेखकों में से हैं, भरतों की जाति को गौरवमयी जाति मानते हैं। भरतों या भरतवंशियों को अब भर शब्द या राजभर शब्द से जाना-पहचाना जाने लगा। इसी पर अमर लाल नागर जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह भरतवंशी जाति कहाँ गायब हो गयी। नागर जी ने "गदर के फूल" नामक ग्रन्थ में भारत की वन्दना इस प्रकार की है –

"वन्दे भरत भूमि अति पावन।"

भर, राजभर, भरतवंशी बन्धुओं को सन्देश

आप अपने नाम के साथ भर, राजभर, सिंह, राय आदि जो भी लगायें, लेकिन अन्त में भरतवंशी अवश्य जरूर लगायें। इससे देश और विदेश में बन्धुओं में एक पहचान बन जायेगी।

बन्धुओं से निवेदन है कि इसकी 10 प्रति फोटो स्टेट कराकर और लोगों में बाँटने की कृपा करें।

निवेदक

अध्यक्ष

वंशराज प्रसाद

भरतवंशी राजभर महासभा, उत्तर प्रदेश

पता – कचहर, रामतलाब, जिला – वाराणसी, उत्तर प्रदेश

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