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न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका प्रथम अंक – मुख्य संपादकीय

 


न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका

प्रथम अंक – मुख्य संपादकीय

इतिहास का सच बनाम झूठ : अब जागने का समय है

"सदा सत्य बोलो, सुखी रहो।"

भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि विश्व की प्राचीनतम सभ्यता, सनातन संस्कृति, ज्ञान, तप, त्याग और वीरता की पावन भूमि है। गंगा, यमुना और सरस्वती की यह धरती श्रीराम की मर्यादा, श्रीकृष्ण के धर्म, भगवान बुद्ध की करुणा और महादेव की तपस्या से आलोकित रही है। किन्तु यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि समय के साथ हमारे इतिहास के अनेक स्वर्णिम अध्याय धूमिल कर दिए गए, अनेक वीर वंशों को विस्मृति के अंधकार में धकेल दिया गया और नई पीढ़ी को अपने गौरवपूर्ण अतीत से दूर कर दिया गया।

आज भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है—भारत का वास्तविक इतिहास क्या है और इतिहास के नाम पर हमें क्या पढ़ाया गया है?

इतिहास किसी राष्ट्र की आत्मा होता है। जिस समाज का इतिहास उससे छीन लिया जाता है, उसका आत्मविश्वास, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है। इसलिए इतिहास का पुनर्पाठ केवल अतीत की चर्चा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य है।

भारतीय परंपराओं में भारशिव नागों का नाम गौरव और पराक्रम के साथ लिया जाता है। विभिन्न ऐतिहासिक परंपराओं और विद्वानों के उल्लेखों में यह वर्णित है कि भारशिव शासकों ने विदेशी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष किया, वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान का कार्य किया और भगवान शिव को अपना आराध्य मानकर अपने कंधों पर शिवलिंग धारण किया। परंपरागत मान्यता के अनुसार उन्होंने अपने पराक्रम और सार्वभौम सत्ता के प्रतीक स्वरूप दस अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए।

काशी का प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट भारतीय जनमानस में इन्हीं दस अश्वमेध यज्ञों की स्मृति से जुड़ा हुआ माना जाता है। यह केवल एक घाट नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति, वैदिक परंपरा और राष्ट्र गौरव का प्रतीक है।

इसी प्रकार कांतिपुर (वर्तमान मिर्जापुर क्षेत्र से संबद्ध ऐतिहासिक परंपराएँ) भी भारशिवों की स्मृतियों और उनकी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। यह क्षेत्र केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक चेतना का केंद्र रहा है, जिस पर गंभीर शोध और निष्पक्ष अध्ययन की आवश्यकता है।

दुर्भाग्यवश, इतिहास लेखन के अनेक चरणों में कुछ ऐसे तथ्य उपेक्षित रह गए जिनके कारण अनेक समाज अपने गौरवपूर्ण अतीत से अनभिज्ञ हो गए। हमें इतिहास को किसी जातीय अहंकार या वैमनस्य का माध्यम नहीं बनाना है, बल्कि सत्य, प्रमाण और राष्ट्रीय दृष्टि से उसका पुनर्मूल्यांकन करना है।

सनातन भारतीय चिंतन में मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, बल्कि उसके गुण, कर्म और संस्कार से होती थी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है—

"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।"

अर्थात् समाज की व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं। यही भारत की मूल चेतना है, यही सनातन का संदेश है और यही सामाजिक समरसता का आधार है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी को उसके वास्तविक इतिहास, उसके पूर्वजों के त्याग, उसके राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत और उसके गौरवपूर्ण अध्यायों से परिचित कराया जाए। समाज तभी जागृत होगा जब वह अपने अतीत को समझेगा, अपने वर्तमान को पहचानेगा और अपने भविष्य का निर्माण स्वयं करेगा।

आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें—

हम सत्य को जानेंगे।

हम इतिहास के छिपे अध्यायों को सामने लाएँगे।

हम अपने पूर्वजों के गौरव का सम्मान करेंगे।

हम समाज में समरसता, एकता और राष्ट्रीय चेतना का दीप जलाएँगे।

हम सत्य, न्याय और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगे।

क्योंकि कोई भी राष्ट्र तभी महान बनता है जब उसकी नई पीढ़ी अपने इतिहास, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों के गौरव को पहचानती है।

सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।

सदा सत्य बोलो, सुखी रहो।

– कैलाश नाथ राय भरतवंशी

राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

प्रधान संपादक, न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका

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