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भारशिव नागों के दस अश्वमेध यज्ञ : इतिहास, परंपरा और प्रमाण

 


भारशिव नागों के दस अश्वमेध यज्ञ : इतिहास, परंपरा और प्रमाण

सत्य की खोज में एक विनम्र प्रयास

भारत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उन महान परंपराओं का इतिहास है जिन्होंने भारतीय संस्कृति, धर्म और राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा। ऐसे ही गौरवशाली अध्यायों में भारशिव नागों का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।

कौन थे भारशिव?

प्राचीन भारत में नागवंशी शासकों की अनेक शाखाओं का उल्लेख मिलता है। इतिहासकारों ने मध्य भारत और गंगा-यमुना क्षेत्र में शासन करने वाले एक शक्तिशाली नागवंश को भारशिव नाम से संबोधित किया है। इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल ने अपने शोध में भारशिवों का उल्लेख करते हुए उन्हें एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति माना, जिन्होंने उत्तर भारत में पुनः हिंदू सत्ता के उदय में भूमिका निभाई।

"भारशिव" नाम का अर्थ

कुछ इतिहासकारों और परंपराओं के अनुसार "भारशिव" का अर्थ है—वे वीर जिन्होंने भगवान शिव को अपना आराध्य मानकर शिवलिंग को अपने कंधों पर धारण किया। यह परंपरा उनके शिवभक्ति और धार्मिक समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।

दस अश्वमेध यज्ञ की परंपरा

भारतीय ऐतिहासिक साहित्य में यह उल्लेख मिलता है कि भारशिव शासकों ने अपनी सार्वभौम सत्ता और वैदिक परंपरा के पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में अनेक अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए। कुछ विद्वानों ने विशेष रूप से दस अश्वमेध यज्ञों की परंपरा का उल्लेख किया है। यह मान्यता भारतीय इतिहास-लेखन और परंपरागत कथाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

दशाश्वमेध घाट और परंपरा

काशी का प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख तीर्थ है। इसके नाम के संबंध में विभिन्न परंपराएँ प्रचलित हैं। एक प्रचलित मान्यता इसे दस अश्वमेध यज्ञों की स्मृति से जोड़ती है। यद्यपि इस विषय पर विद्वानों के विभिन्न मत हैं, फिर भी यह परंपरा भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण अंग है।

कांतिपुर और भारशिव परंपरा

कांतिपुर (जिसे कुछ स्थानीय ऐतिहासिक परंपराएँ वर्तमान मिर्जापुर क्षेत्र से जोड़ती हैं) को लेकर भी अनेक सामाजिक और ऐतिहासिक स्मृतियाँ विद्यमान हैं। इस विषय पर और अधिक पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और ऐतिहासिक अनुसंधान की आवश्यकता है, ताकि उपलब्ध परंपराओं और प्रमाणों का सम्यक् अध्ययन किया जा सके।

उपलब्ध ऐतिहासिक आधार

भारशिवों के अध्ययन में निम्न प्रकार के स्रोत महत्वपूर्ण माने जाते हैं—

प्राचीन अभिलेख और शिलालेख।

पुराणों और वंशावलियों के उल्लेख।

प्राचीन भारतीय मुद्राएँ (सिक्के)।

आधुनिक इतिहासकारों द्वारा किए गए शोध।

स्थानीय परंपराएँ और सांस्कृतिक स्मृतियाँ।

इतिहास का कार्य केवल परंपरा को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रमाणों का गंभीर अध्ययन करना भी है। इसलिए भारशिव नागों, उनके अश्वमेध यज्ञों और उनसे संबंधित स्थलों पर और अधिक शोध की आवश्यकता है।

हमारा दायित्व

नई पीढ़ी को अपने इतिहास से जोड़ना, उपेक्षित अध्यायों पर शोध को प्रोत्साहित करना और सत्य की खोज को आगे बढ़ाना हम सबका दायित्व है। इतिहास किसी समाज को बाँटने का नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना और आत्मगौरव को जागृत करने का माध्यम होना चाहिए।

सत्य की खोज ही इतिहास का धर्म है, और इतिहास का उद्देश्य राष्ट्र को उसकी जड़ों से जोड़ना है।

– कैलाश नाथ राय भरतवंशी

राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ

प्रधान संपादक, न्यू मार्तण्ड साप्ताहिक पत्रिका

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