महाजागरण विशेषांक: भर और पासी - दो भिन्न ऐतिहासिक पहचान एवं पुरातात्विक सत्य
प्रस्तुति: राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
मार्गदर्शन: कैलाश नाथ राय भरतवंशी (राष्ट्रीय अध्यक्ष), अमरीष राय सूर्यवंशम (राष्ट्रीय महासचिव)
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प्रस्तावना: इतिहास का संशोधन क्यों आवश्यक है?
भारत के औपनिवेशिक और आधुनिक इतिहास-लेखन में सबसे बड़ा भ्रम 'भर' (वैदिक भारशिव राजवंश) और 'पासी' (अवध का स्थानीय सुरक्षाकर्मी समाज) को एक ही सामाजिक वर्ग में मिलाना रहा है।
ब्रिटिश जनगणना अधिकारियों (1881-1901) ने केवल सामाजिक-आर्थिक स्थिति और भौगोलिक क्षेत्र (उत्तर प्रदेश/बिहार) के आधार पर इन दोनों भिन्न पहचानों को एक श्रेणी में वर्गीकृत कर दिया। परंतु, शिलालेख (Inscriptions), मुद्रा शास्त्र (Numismatics), मुग़लकालीन राजस्व दस्तावेज़ (Revenue Records) और संस्कृत ग्रंथ इस दावे को पूरी तरह से नकारते हैं।
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भाग 1: भर (भारशिव) - पुरातात्विक, शिलालेखीय और मौद्रिक इतिहास
1. ऋग्वेद और वैदिक गोत्र परंपरा:
• वैदिक उल्लेख: ऋग्वेद (मण्डल 3, 7) में "भरत" और "भर" शब्द का उल्लेख बहुलता से आया है।
• वंश परंपरा: भर समाज में आज भी भरद्वाज, वत्स और कश्यप जैसे वैदिक गोत्र पाए जाते हैं। यह कोई बाद में अपनाया गया नाम नहीं, बल्कि प्राचीन वंशानुगत परंपरा का निरंतर प्रवाह है।
2. शिलालेख एवं अभिलेखीय साक्ष्य (Epigraphic Proofs):
• प्रयाग-कौशांबी एवं वाकाटक अभिलेख: वाकाटक नरेश प्रवरसेन द्वितीय के प्रसिद्ध चम्मच ताम्रपत्र (Chammak Copper Plate) में भारशिव राजवंश का प्रामाणिक विवरण दर्ज है:
"अंसभार-सन्निवेशित-शिवलिङ्ग-द्वहनाम् भारशिवानाम्"
(अर्थात: जिन्होंने अपनी पराक्रम शक्ति से गंगा-यमुना के प्रदेशों को मुक्त कराया और कंधों पर शिवलिंग धारण कर 10 अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए, वे भारशिव राजा हैं।)
(संदर्भ: Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol. III)
• जौनपुर का अटाला अभिलेख (1377 ई.): अटाला मस्जिद के निर्माण से पूर्व के शिलालेखीय अवशेषों में दर्ज है कि यह परिसर प्राचीन भर राजाओं के मंदिर/दुर्ग का स्थान था।
(संदर्भ: Archaeological Survey of India Report, Alexander Cunningham, Vol. XI)
• बलिया व पूर्वांचल के भरौली शिलालेख: 'श्री भर राजा' और भर दुर्गों (गढ़ों) की उपस्थिति शिलालेखीय और पुरातात्विक सर्वेक्षणों में सिद्ध है।
3. मुद्रा शास्त्र (Numismatic Evidence - सिक्कों का साक्ष्य):
• भारशिव-नागकालीन तांबे के सिक्के: मिर्ज़ापुर के कांतिपुरी, कौशांबी, आज़मगढ़ और अहिच्छत्र के उत्खनन में तांबे के प्राचीन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
• अंकन: इन सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में "श्री नवनाग", "भवनाग" अथवा राजवंश के चिन्ह जैसे "शिवलिंग", "त्रिशूल" और "नंदी" स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण हैं।
• संग्रहालय रिकॉर्ड: ये पुरातात्विक सिक्के राज्य संग्रहालय लखनऊ (State Museum, Lucknow) और इलाहाबाद संग्रहालय (Allahabad Museum) में पंजीकृत एवं सुरक्षित हैं।
(संदर्भ: K.P. Jayaswal, 'History of India 150 A.D. to 350 A.D.', pp. 16-35; V.A. Smith, 'Catalogue of Coins in the Indian Museum, Kolkata')
4. मुग़लकालीन एवं मुस्लिम इतिहासकारों के साक्ष्य:
• फारसी इतिहास ग्रंथ: ताज-उल-मासिर (हासिम निज़ामी), तबकात-ए-नासिरी (मिन्हाज-उस-सिराज) और तारीख-ए-फिरोजशाही (जियाउद्दीन बरनी) में अवध और पूर्वांचल के शासकों के लिए स्पष्ट रूप से "भर राय" (Bhar Rai) या "भर राजा" शब्द का प्रयोग किया गया है।
• आइन-ए-अकबरी (1590 ई.): अकबर के वित्त मंत्री अबुल फ़ज़ल द्वारा लिखित आइन-ए-अकबरी (भाग 2) में अवध और इलाहाबाद सरकार के परगनों के राजस्व ब्योरे में "भर (Bhar)" जाति को ज़मींदार और दुर्गपति के रूप में दर्ज किया गया है।
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भाग 2: 'पासी' शब्द की उत्पत्ति और ऐतिहासिक संदर्भ
1. प्राचीन ग्रंथों एवं शिलालेखों में अनुपस्थिति:
वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, अथवा गुप्तकालीन व राजपूतकालीन किसी भी पत्थर के शिलालेख या ताम्रपत्र पर "पासी" शब्द का उल्लेख नहीं मिलता।
2. शब्द की व्युत्पत्ति और प्राथमिक संदर्भ:
• प्रशासनिक भूमिका: 'पासी' शब्द का मूल फारसी/मुग़लकालीन प्रशासनिक शब्द "पासबान" (Pashban - पहरेदार/चौकीदार) या संस्कृत के "पाशिक" (जाल/फंदा धारण करने वाला) से माना जाता है।
• 16वीं-18वीं सदी के रिकॉर्ड: मुग़ल और अवध के नवाबों के राजस्व कागज़ात में 'पासी' शब्द का प्रयोग ग्राम-सुरक्षा (Watchmen) और स्थानीय पहरेदारी के पेशे से जुड़े वर्ग के लिए प्रारंभ हुआ।
3. लोककथा बनाम राजकीय अभिलेख:
अवध की लोककथाओं में बिजली पासी, सातन पासी जैसे लोकनायकों का वर्णन मिलता है। परंतु पुरातात्विक दृष्टि से लखनऊ के बिजनौर और आसपास के किलों के पत्थरों व पुरानी सनदों में मूल शब्द "बिजली राय" या "भर शासक" दर्ज है। लोकगाथाओं में कालान्तर में क्षेत्रीय बोली के प्रभाव से "राय" या "भर" शासकों को स्थानीय वर्ग द्वारा अपने से जोड़कर देखा गया।
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भाग 3: तुलनात्मक वर्गीकरण (Comparative Analysis)
• मूल एवं उत्पत्ति:
- भर (भारशिव): वैदिक (भारशिव नागवंश, राजवंश)
- पासी: मुग़ल/मध्यकालीन (पासबान/स्थानीय सुरक्षा)
• गोत्र एवं वंश:
- भर (भारशिव): भरद्वाज, वत्स, कश्यप (ब्राह्मण-क्षत्रिय समकक्ष)
- पासी: रावत, कैथवास, त्रिशूलिया, गुजरिया आदि
• पुरातात्विक साक्ष्य:
- भर (भारशिव): शिलालेख (प्रयाग, जौनपुर), सिक्के (लखनऊ व इलाहाबाद म्यूजियम)
- पासी: कोई प्राचीन शिलालेख या सिक्के उपलब्ध नहीं
• ऐतिहासिक कार्य:
- भर (भारशिव): दुर्ग निर्माण, ज़मींदारी, राज्य संचालन, खेती
- पासी: पहरेदारी (पासबान), बाद के काल में ताड़ी निष्कर्षण
• मुग़ल दस्तावेज़:
- भर (भारशिव): 'आइन-ए-अकबरी' में 'भर ज़मींदार' दर्ज
- पासी: 'पासबान' / स्थानीय ग्राम प्रहरी दर्ज
• वैवाहिक संबंध:
- भर (भारशिव): केवल भर समाज के भीतर (अंतर्विवाही)
- पासी: केवल पासी समाज के भीतर
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निष्कर्ष: ऐतिहासिक सौहार्द की सही दिशा
सच्चा सामाजिक सौहार्द और सम्मान ऐतिहासिक तथ्यों को स्वीकार करने से ही संभव है:
1. भर समाज का गौरव: यह एक शिलालेखीय, मौद्रिक और प्रामाणिक वैदिक-भारशिव राजवंश की परंपरा है, जिसका भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा में अग्रणी योगदान रहा है।
2. पासी समाज का योगदान: यह अवध और मध्यकाल का एक संघर्षशील व निष्ठावान पहरेदार समाज रहा है, जिसका अपना पृथक सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व है।
अंग्रेज़ों द्वारा Census Manuals में किए गए प्रशासनिक सरलीकरण (Classification Error) को इतिहास का अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। भारत के प्रबुद्ध समाज को ब्रिटिश गज़ेटियर की कहानियों के स्थान पर पत्थरों पर उकेरे गए शिलालेखों और संग्रहालयों में रखे सिक्कों को ही सत्य मानना चाहिए।
जय भारशिव! जय भारत!
राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
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