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राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
- महाजागरण अभियान -
"हमारा इतिहास शिलालेखों और सिक्कों पर अंकित है"
समस्त भर समाज बंधुओं,
इतिहास का भ्रम दूर करें! औपनिवेशिक अंग्रेज़ों और मुग़लकालीन भ्रांतियों को
छोड़कर अपने वास्तविक वैदिक एवं पुरातात्विक इतिहास को पहचानें।
• हमारा मूल: वैदिक भरद्वाज, वत्स एवं कश्यप गोत्र परंपरा।
• हमारी पहचान: 10 अश्वमेध यज्ञ करने वाला चक्रवर्ती भारशिव नागवंश।
• हमारा साक्ष्य: प्रयाग, जौनपुर के शिलालेख और संग्रहालयों में रखे सिक्के।
इतिहास की रक्षा, समाज की सुरक्षा!
आइए, अपने गौरवशाली राजवंश के गौरव को पुनः स्थापित करें।
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भारशिव (भर) राजवंश का मौद्रिक साक्ष्य
(प्राचीन सिक्कों के दोनों पहलू)
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[सिक्के का मुख भाग - Obverse]:
• ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण नाम: "श्री नवनाग" / "भवनाग" / "वीरसेन"
• धार्मिक प्रतीक: भगवान शिव का त्रिशूल (Trishul) एवं शिवलिंग
• राजसी प्रतीक: नंदी (वृषभ) की भव्य आकृति
[सिक्के का पृष्ठ भाग - Reverse]:
• स्वस्तिक एवं चक्र (Cakra) का चिन्ह
• नागवंश का राजसी प्रतीक (Serpent Motif)
• यज्ञ की पावन वेदी
• कहाँ सुरक्षित हैं ये सिक्के?:
- राज्य संग्रहालय, लखनऊ (State Museum, Lucknow)
- इलाहाबाद संग्रहालय (Allahabad Museum, Prayagraj)
- मिर्ज़ापुर (कांतिपुरी), कौशांबी एवं आज़मगढ़ के टीलों से प्राप्त तांबे के सिक्के।
इतिहासकार संदर्भ:
डॉ. के. पी. जायसवाल ('History of India 150 A.D. to 350 A.D.')
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वाकाटक राजवंश का शाही 'चम्मक ताम्रपत्र'
(भारशिव क्षत्रियों का सबसे बड़ा साक्ष्य)
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• मूल संस्कृत शिलालेख पाठ:
"अंसभार-सन्निवेशित-शिवलिङ्ग-द्वहनाम् भारशिवानाम्
महाराज-श्री-भवनाग-दौहित्रस्य..."
• सरल हिंदी अर्थ:
"जिन्होंने पराक्रम से गंगा-यमुना के प्रदेशों को मुक्त कराया और कंधों पर
शिवलिंग धारण कर 10 अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए, वे भारशिव राजा हैं..."
• यह ताम्रपत्र सिद्ध करता है:
भारशिव/भर समाज कोई साधारण वर्ग नहीं, बल्कि प्राचीन भारत को स्वतंत्र कराने वाला
10 अश्वमेध यज्ञ संपन्न करने वाला महान राजवंश है।
अभिलेख संदर्भ: Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol. III
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भर राजाओं के शिलालेखीय एवं पुरातात्विक प्रमाण
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1. जौनपुर अटाला मस्जिद का इतिहास (1377 ई.):
अलेक्जेंडर कनिंघम की ASI रिपोर्ट के अनुसार अटाला परिसर प्राचीन भर राजाओं के
भव्य मंदिर और दुर्ग (गढ़) का स्थान था।
- संदर्भ: Archaeological Survey of India (ASI) Report, Vol. XI
2. जौनपुर एवं बलिया के 'भरौली शिलालेख':
पत्थरों पर स्पष्ट रूप से "श्री भर राजा" का उल्लेख दर्ज है।
3. मुग़लकालीन राजस्व रिकॉर्ड (आइन-ए-अकबरी 1590 ई.):
अकबर के काल में अवध और इलाहाबाद ज़ोन के परगनों में "भर (Bhar) ज़मींदार" दर्ज हैं।
पत्थरों के अक्षर कभी झूठे नहीं होते - हमारा इतिहास राजाओं का इतिहास है!
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राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
- महाजागरण अभियान -
भारशिव (भर) राजवंश का ऐतिहासिक एवं मौद्रिक प्रमाण
(सिक्के के दोनों पहलुओं का पुरातात्विक ब्योरा)
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समस्त भर समाज बंधुओं एवं भारत के प्रबुद्ध नागरिकों,
हमारा इतिहास किसी की मौखिक कहानियों या काल्पनिक गप्पों पर निर्भर नहीं है।
भारशिव (भर) राजाओं का इतिहास भारत के संग्रहालयों में रखे पत्थरों पर खुदे
सिक्कों और पुरातात्विक प्रमाणों पर दर्ज है।
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[ पहलू - 1: सिक्के का मुख्य भाग (Obverse)]
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• ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण नाम: "श्री नवनाग" / "भवनाग" / "वीरसेन"
• धर्म और आस्था का प्रतीक: त्रिशूल (Trishul) एवं पवित्र शिवलिंग
• राजसी व शक्ति का प्रतीक: भगवान शिव का नंदी (वृषभ)
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[ पहलू - 2: सिक्के का पृष्ठ भाग (Reverse)]
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• वैदिक प्रतीक: पवित्र स्वस्तिक एवं सूर्य/चक्र (Cakra)
• नागवंश की पहचान: नाग आकृति (Serpent Motif)
• यज्ञ परंपरा: 10 अश्वमेध यज्ञ की प्रतीक पावन वेदी
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[ सिक्के कहाँ प्राप्त हुए और कहाँ सुरक्षित हैं? ]
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• प्राप्ति स्थान: मिर्ज़ापुर का कांतिपुरी क्षेत्र, कौशांबी, आज़मगढ़ और अहिच्छत्र।
• सुरक्षित स्थान:
1. राज्य संग्रहालय, लखनऊ (State Museum, Lucknow)
2. इलाहाबाद संग्रहालय, प्रयागराज (Allahabad Museum)
3. भारतीय संग्रहालय, कोलकाता (Indian Museum, Kolkata)
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[ प्रामाणिक इतिहासकार एवं पुरातात्विक ग्रंथ ]
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• डॉ. के. पी. जायसवाल: 'History of India 150 A.D. to 350 A.D.' (पृष्ठ 16-35)
• वी. ए. स्मिथ: 'Catalogue of Coins in the Indian Museum, Kolkata'
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"पत्थर और तांबे पर लिखे अक्षर कभी मिटते नहीं,
सिक्के चिल्लाकर कहते हैं - भर राजाओं का राज था!"
राष्ट्रीय अध्यक्ष: कैलाश नाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय महासचिव: अमरीष राय सूर्यवंशम
जय भारशिव! जय भरतवंश! जय हर-हर महादेव!
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