भर / भारसु / भारशिव क्षत्रिय राजवंश: ऐतिहासिक, शिलालेखीय, ताम्रपत्र एवं मुद्रा साक्ष्य
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प्रणेता एवं संदेश:
कैलाशनाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
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1. प्रस्तावना
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इतिहास किसी भी समाज और संस्कृति की चेतना, गौरव और स्वाभिमान का मूल आधार होता है। 'भर' (भारसु/भारशिव) क्षत्रिय राजवंश का इतिहास केवल अनुश्रुतियों या किंवदंतियों पर आश्रित नहीं है; बल्कि भारतीय इतिहास के पन्नों में प्राचीन शिलालेखों, ताम्रपत्रों, सिक्कों (मुद्राओं) तथा प्रामाणिक ग्रंथों में इसके स्पष्ट और अमिट प्रमाण दर्ज हैं।
गंगा-यमुना के पावन दोआब से लेकर पूर्वांचल, मध्य भारत और बुंदेलखंड तक फैला भर/भारसु/भारशिव क्षत्रिय वंश का साम्राज्य भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म और वैदिक परंपरा का प्रमुख रक्षक रहा है। राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ के माध्यम से हम अपने इस गौरवशाली इतिहास को समस्त प्रामाणिक साक्ष्यों के साथ जन-जन तक पहुँचाने हेतु प्रतिबद्ध हैं।
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2. शिलालेखीय प्रमाण (Epigraphical Evidences)
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(क) प्रयाग प्रशस्ति एवं भारशिव शिलालेख (3री शताब्दी ईस्वी)
• मुख्य साक्ष्य: "भारशिवानाम् महाराज" (भारसु/भारशिव क्षत्रिय नरेश)
• विवरण: प्रयाग (इलाहाबाद) और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों से प्राप्त प्राचीन शिलालेखों में भारशिव/भारसु राजवंश के पराक्रम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। शिलालेखों में भारशिव राजाओं के लिए "भारशिवानाम् महाराज" उपाधि का प्रयोग किया गया है, जो उनकी संप्रभुता और स्वतंत्र राजसत्ता का प्रमाण है। भारशिव/भारसु शासकों ने कांतिपुरी (कुतवार), नागपुर और नवनाग (पद्मावती) को केंद्र बनाकर शासन किया तथा विदेशी आक्रमणकारियों (कुषाणों) को परास्त कर आर्यावर्त में सनातन वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की।
(ख) भरौली शिलालेख, बलिया (श्री भर राजा का शासन)
• मुख्य साक्ष्य: "श्री भर राजा" एवं स्थानीय भारसु क्षत्रिय राजवंश
• विवरण: पूर्वांचल के बलिया ज़िले के भरौली ग्राम से प्राप्त प्राचीन पाषाण शिलालेख पर स्पष्ट रूप से "श्री भर राजा" उत्कीर्ण है। यह शिलालेख पूर्वांचल क्षेत्र में भर/भारसु क्षत्रिय राजाओं के सुदृढ़ और व्यवस्थित राजतंत्र का प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण है।
(ग) अटाला मस्जिद शिलालेख, जौनपुर (1377 ई.)
• मुख्य साक्ष्य: भर/भारसु राजाओं द्वारा निर्मित प्राचीन स्थापत्य व मंदिर
• विवरण: जौनपुर स्थित अटाला मस्जिद के निर्माण में प्रयुक्त प्राचीन पाषाण शिलाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख यह सिद्ध करते हैं कि यह संरचना मूल रूप से भर/भारसु क्षत्रिय राजाओं द्वारा निर्मित एक भव्य मंदिर एवं वास्तुशिल्प का भाग थी। शर्की एवं तुगलक काल में भी ये शिलालेख अक्षुण्ण रहे, जो भर स्थापत्य कला का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
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3. ताम्रपत्र प्रमाण (Copper Plate Inscriptions)
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(क) भारशिव-वाकाटक प्रभावतीगुप्त ताम्रपत्र (चम्मक, पूना एवं ऋद्धपुर ताम्रपत्र)
• मुख्य साक्ष्य: 10 अश्वमेध यज्ञों का आयोजन एवं भारशिव/भारसु राजवंश
• विवरण: गुप्त और वाकाटक राजवंश के प्रसिद्ध ताम्रपत्रों (जैसे पूना, ऋद्धपुर और चम्मक ताम्रपत्र) में भारशिव/भारसु क्षत्रियों के गौरवशाली पराक्रम का उल्लेख मिलता है। इसमें स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण है:
"अत्यन्त-स्वामि-महाभैरव-भक्तस्य दश-अश्वमेधावभृथ-स्नान-पवित्रीकृत-भारशिवानाम्..."
अर्थात्, भारशिव/भारसु क्षत्रिय राजाओं ने पवित्र गंगा जल को अपने मस्तक पर धारण कर तथा भगवान शिव (महाभैरव) की आराधना करते हुए आर्यावर्त की स्वतंत्रता हेतु 10 अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए थे। भारशिव सम्राट भवनाग की पुत्री का विवाह वाकाटक युवराज रुद्रसेन प्रथम से हुआ था, जिसका उल्लेख इन ताम्रपत्रों में अत्यधिक सम्मान के साथ दर्ज है।
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4. मुद्रा एवं सिक्के प्रमाण (Numismatic Evidences)
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(क) कांतिपुरी, पद्मावती और कौशाम्बी के भारशिव/भारसु सिक्के
• मुख्य साक्ष्य: राजा भवनाग, नवनाग, वीरसेन और गणपति नाग के तांबे व चाँदी के प्राचीन सिक्के।
• विवरण:
- मुद्रा चिह्न: भारशिव/भारसु राजाओं द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर त्रिशूल, नंदी (वृषभ), नंदीपद, चक्र और शिवलिंग के प्रतीक चिन्ह स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण मिलते हैं।
- प्राप्ति स्थल: ग्वालियर, पद्मावती (पवाया), मथुरा, कौशाम्बी और वाराणसी के पुरातात्विक उत्खनन से भारी संख्या में भारशिव/भारसु राजवंश की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
- ऐतिहासिक महत्त्व: प्राचीन भारत में अपने नाम और चिह्नों के सिक्के (मुद्राएँ) जारी करने का अधिकार केवल स्वतंत्र और सार्वभौम (सॉवरेन) राजाओं को ही होता था। ये मुद्राएँ अकाट्य रूप से सिद्ध करती हैं कि भर/भारसु क्षत्रिय राजवंश अपने काल का एक अत्यंत शक्तिशाली, संपन्न और विशाल साम्राज्य था।
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5. ऐतिहासिक साक्ष्य संक्षेप तालिका
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│ साक्ष्य का प्रकार │ प्राप्ति स्थल / अभिलेख │ मुख्य ऐतिहासिक निष्कर्ष │
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│ शिलालेख │ प्रयाग प्रशस्ति │ "भारशिवानाम् महाराज" उपाधि व संप्रभुता का प्रमाण │
│ शिलालेख │ भरौली (बलिया) │ "श्री भर राजा" उत्कीर्ण, स्थानीय राजतंत्र का प्रमाण │
│ स्थापत्य अभिलेख │ अटाला (जौनपुर) │ प्राचीन भर स्थापत्य कला व मंदिर निर्माण का साक्ष्य │
│ ताम्रपत्र │ पूना, चम्मक व ऋद्धपुर │ 10 अश्वमेध यज्ञ एवं वाकाटक राजवंश से वैवाहिक संबंध │
│ मुद्राएँ (सिक्के) │ पद्मावती, कौशाम्बी, मथुरा│ भवनाग व नवनाग के सिक्के (शिवलिंग, त्रिशूल व नंदी अंकित) │
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6. भरद्वाज गोत्र एवं वैदिक परंपरा (Vedic Lineage)
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• मुख्य साक्ष्य: ऋषि भरद्वाज परंपरा, यज्ञ अनुष्ठान एवं क्षत्रिय धर्म
• विवरण: भर/भारसु/भारशिव क्षत्रिय राजवंश का संबंध प्राचीन भरद्वाज गोत्र और वैदिक ऋषि परंपरा से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह राजवंश केवल युद्ध कला में निपुण नहीं था, बल्कि वैदिक संस्कृति, ज्ञान परंपरा, मंदिर निर्माण और सनातन मूल्यों का प्रमुख रक्षक रहा है। अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान और शिव-भक्ति इस वंश की सांस्कृतिक एवं धार्मिक उच्चता को प्रमाणित करती है।
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7. निष्कर्ष एवं संकल्प
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प्रयाग, बलिया और जौनपुर के शिलालेख, वाकाटक-गुप्त काल के ताम्रपत्र, कांतिपुरी व पद्मावती के सिक्के (मुद्राएँ) और भरद्वाज गोत्र की निरंतरता—ये सभी प्रामाणिक साक्ष्य निर्विवाद रूप से सिद्ध करते हैं कि भर / भारसु / भारशिव क्षत्रिय राजवंश भारतवर्ष का एक अत्यंत वैभवशाली, पराक्रमी और धर्मरक्षक राजवंश रहा है।
"इतिहास ही हमारी पहचान • शिलालेख, ताम्रपत्र एवं मुद्राएँ हमारे प्रमाण"
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आह्वानकर्ता एवं प्रणेता:
आदरणीय कैलाशनाथ राय भरतवंशी
राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय भारशिव क्षत्रिय महासंघ
(स्रोत आधार: अभिलेखीय अध्ययन, ताम्रपत्र, मुद्रा साक्ष्य — प्रयाग • बलिया • जौनपुर • पद्मावती • वैदिक परंपरा)
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